सालासर (राजस्थानलिंक.काॅम) - लक्षमणगढ रोड़ पर स्थित चमेली देवी अग्रवाल मांगलिक सभागार के पीछे अंजनी मताा मंदिर के पास अवधेशानन्द मिशन प्रभु प्रेमी संघ चेरिटेबल ट्रस्ट की ओर से सालासर धाम मे चल रही सात दिवसीय श्रीराम कथा के चैथे दिन जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरी महाराज ने श्रीराम कथा के अनेक प्रसंग सुनाए। आयोजन समिति के महेन्द्र लोहारिया, नीरज गर्ग, सीमा प्रभु, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व-कुलपति डॉ. रामसेवक दूबे, महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी ललितानन्द गिरि महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी अपूर्वानन्द गिरि महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी राजराजेश्वरानन्द गिरि महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी कर्णपुरी महाराज, पूज्य श्रीमहन्त स्वामी अशोक गिरि ने पूजा की।
कथा मे महाराज ने कहा कि भगवान सत चित आनन्द स्वरूप हैं। जीवन का परम सत्य उसी अविनाशी, परम सत्ता का साक्षात्कार है और वही जीवन की सिद्धि है। वेद का शीर्षस्थ भाग उपनिषद् है। प्रणव ॐ को लक्ष्य बनाकर परमेश्वर तक पहुँचा जा सकता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार ॐ स्वयं ईश्वर का स्वरूप है और गायत्री का सार भी। वेदों की साधना गुरु सानिध्य, उपनयन और नित्य परायण से पुष्ट होती है तभी वह जीवित अनुभव बनती है। काशी में भगवान महादेव द्वारा प्रदत्त राम नाम का तारक मंत्र साधक के जीवन और मृत्यु दोनों में कल्याणकारी है। यह महापातकों का नाश करता है।

महाराज ने कहा कि गुरु विश्वामित्र के साथ दोनों भाइयों को देखकर राजा जनक की समाधिसदृश अवस्थाय पुष्प-वाटिका में भगवान राम व माता सीता का प्रथम साक्षात्कारय और माता पार्वती की आराधना हेतु सीता माता का मन्दिर गमन ये सभी प्रसंग सहजता और दिव्यता के संगम बने।
महाराज ने कहा कि धनुष यज्ञ के माध्यम से सहजता का महत्त्व विशेष रूप से उद्घाटित हुआ। जहाँ अनेक प्रतापी राजा असफल रहे, वहीं गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम ने शान्त, सरल भाव से धनुष भंग किया। उसी सहजता से जगतजननी सीता ने प्रभु के गले में जयमाला अर्पित की। इस दौरान श्रीकिशन पुजारी, मिठनलाल पुजारी, काबर पुजारी, यशोदानन्दन पुजारी, रविशंकर पुजारी, सत्यप्रकाश, अरविन्द पुजारी, राकेश पुजारी नागरमल पुजारी, प्रथम पुजारी सहित हजारो श्रोता उपस्थित रहे।