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दूसरों के सुख से सुखी होना और दूसरों के दुख से दुखी होना ही संत होने के लक्षण हैं - मंहत दिनेशगिरि महाराज।

सालासर (राजस्थानलिंक.काॅम) - गांव गुडावड़ी श्याम बाबा मंदिर मे चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवे दिन शनिवार को कथावाचक दिनेश गिरी महाराज ने भरत चरित्र, माता शबरी का प्रसंग सुनाया।
महाराज ने बताया कि जब भरत को अपनी माता द्वारा श्रीराम को वनवास भेजे जाने का समाचार मिला, तो उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उन्होंने चित्रकूट जाकर श्रीराम से भेंट की। चित्रकूट में राम और भरत के मिलाप और संवाद का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि भरत को देखकर श्री राम के धनुष-बाण गिर पड़े। भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटने की प्रार्थना की, जिस पर राम ने कहा कि यदि वे लौट जाएंगे तो शबरी माता को दर्शन कैसे दे पाएंगे। इसके बाद भगवान ने अपनी चरण पादुका देकर भरत जी को अयोध्या वापस भेजा।
कथावाचक ने कहा भरत के समान भाई के त्याग और प्रेम को अद्वितीय बताया। उन्होंने कहा कि भरत चरित्र को नियम से सुनने से श्री राम के चरणों में प्रेम उत्पन्न होता है। भरत चरित्र की विस्तृत व्याख्या करते हुए उन्होंने वर्तमान समाज से तुलना की, जहां एक इंच ज़मीन के लिए भी कोर्ट में लड़ाई होती है, जबकि श्री राम ने भरत के लिए अपना राज्य छोड़ दिया और भरत ने भी उस राज्य को अपने बड़े भाई को वापस लौटा दिया। महाराज जी ने बताया कि भ्गावान श्रीराम प्रेम की मूर्ति है और प्रभु सदैव अपने भक्तों पर करुणा बरसाने वाले है। दूसरों के सुख से सुखी होना और दूसरों के दुख से दुखी होना ही संत होने के लक्षण हैं।
कथा में महावीरजति महाराज गाड़ौदा, आयोजन कमेटी के सियाराम स्वामी, राजेंद्र गोयल, कृष्ण गोयल, बसंत पुजारी, नेमनारायण पुजारी, सदगुरु पुजारी, हरिप्रसाद, मोहन सांवरमल शर्मा सुल्तान सहित सैकड़ो श्रोता उपस्थित रहे। 

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